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दिल की गुस्ताखियाँ(प्यार)

Posted On 30 Dec, 2015 Others, Others में

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आज ये बाबला सा दिल तोड़ी सी मुश्किल में है समझ नई आता इसे कौन से राश्ते को अपनाये..
एक तो मंजिल वो है जो हज़ारो गलियो से होते हुए,गुज़रते हुए सीधे रूह को सुकून और खुद को महफूज़ होने का अहसास कराती है.वो हैं माँ- बाबू जी जिन्हे हम इस दुनिया में आने के पहले से ही महसूस करने लगते है और उन्हें कभी खोना नहीं चाहते और दूसरी मंज़िल वो है जो हज़ारो टेड़े- मेढे राश्ते से गुज़रते हुये किसी और को महफूज रखने का अहसास कराती है..वो है…एक अनजाना सा प्यार…जिसे हम इस दुनिया में रहने से लेकर ज़िन्दगी के बाद भी महसूस करते रहना चाहता है..
“आज के करीब हर एक नौजबान दिल के इस असमंजस भरे परिस्थिति से गुजर रहे है…अरे नौजबान क्या शायद हमारे माँ-पिता जी, ताई-ताऊ जी भी शायद इस असमंजस भरे परिस्थिति से गुजरे होंगे….कहने का मतलब ये है की हर एक वयक्ति चाहे कोई भी हो उनके साथ ये परिस्थिति कभी भी आ सकती है या पहले कभी आ चुकी हो….” तो वैसे परिस्थिति में किसी को भी सबसे जय्दा परिवार की जरूरत होती है….ना की किसी गैर की…
हर एक वयक्ति चाहता है की वो अपने परिवार को खुश रखे..हमेशा घर वालो का साथ उनके करीब रहे…
कोई भी उनसे बिछड़े ना..कोई भी नहीं चाहता की छोटी सी गलती के कारण भी परिवार वालो का दिल दुखे.. हर किसी के लिए उनके परिवार वाले प्यारे होते है…
लेकिन ऐसा क्या हो जाता है की “दिल की छोटी से गुस्ताखियाँ” के कारण परिवार वाले उस इंसान के लिए दुश्मन बन जाते हैं..और वो इंसान उनके परिवार के लिए..चाहे कितनी भी वेस्टर्न संस्कृति हमारे भारत को छेड़े लेकिन उसका स्तम्भ (नींब) को कभी छू भी नहीं सकता…
लोग कितने भी नए संस्कृति को अपना ले लेकिन पुराने को छोर नहीं सकते..
लेकिन जो “दिल की गुस्ताखियाँ” मतलब (प्यार) हमारे पुराणो में जिसका वर्णन किया गया है क्या वो गलत है…जिस “दिल की गुस्ताखियाँ” करने से ईश्वर ना बच सके तो हम इन्सान क्या है..
आज-कल होने वाले अपराध जो हमारे संस्कृति को हिला रही है उसे हटाने के लिए हर एक परिवार वालो को अपने “बच्चों” को समझना बहुत जरुरी है…अगर वो किसी गलत राह पर है तो उन्हें सही राह दिखाने की जरुरत है…और हर एक बच्चो को अपने माँ-पिता जी और परिवार वालो की आदर ..
” so respect your family and also respect the feeling of each and everyone”

Web Title : Maa

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
January 4, 2016

आदरणीया संमिता जी ! मंच पर स्वागत है ! सांसारिक प्रेम किया जाता है या समय आने पर हो जाता है, इसे लेकर विद्वानों के बीच विवाद है ! प्यार के कई रंगरूप हैं.. माता पिता भाई बहन और मित्र आदि ! एक रूप और है, प्रेमी या पति का ! अपनी जगह सब महत्वपूर्ण और आकर्षक हैं ! प्रेम यदि सच्चा है तो उसका आधार हमेशा त्याग रहेगा ! पाने से ज्यादा देने की अनुभूति ! अच्छ लिखा है आपने ! यूँ ही लिखती रहिये ! बहुत बहुत शुवभ्कामनाएं और नववर्ष की बधाई !

sanmitadeo के द्वारा
January 4, 2016

धन्यवाद जी…बहुत-बहुत शुक्रिया की अपने मेरी इस छोटी सी टिपण्णी पर अपना विचार प्रस्तुत किया.. जैसा की आपने कहा प्रेम को लेकर हज़ारो व्यख्या प्रस्तुत किये गए है लेकिन इसकी शुरुआत कब होती है कब ख़त्म किसी को नई पता… हज़ारो वाद विदाद हुए है विद्वानो के बीच लेकिन सद्गुरु जी मैं आपको ये कहना चाहती हुँ की जिस प्रेम की भाषा को ईश्वर न समझ सके उसे ये तुच्छ से इंसान क्या समझेंगे……. आपको भी नए साल की हार्दिक शुभ कामनाये…


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